अध्याय 18 श्लोक
सन्न्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् । त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन।
अर्जुन बोले - हे महाबाहो! हे हृषीकेश! हे केशिनिषूदन! मैं संन्यास का तत्त्व जानना चाहता हूँ और त्याग का भी, दोनों को अलग-अलग समझना चाहता हूँ।
Arjuna said: O mighty-armed Krishna, O Hrishikesha, O slayer of Keshi! I wish to understand the truth of renunciation (sannyasa) and also of relinquishment (tyaga), and the distinction between them.
काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः। सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः।
श्री भगवान बोले - काम्यकर्मों का त्याग संन्यास है, ऐसा विद्वान जन कहते हैं और सभी कर्मों के फल का त्याग त्याग है, ऐसा बुद्धिमान लोग कहते हैं।
The Blessed Lord said: The wise understand renunciation (sannyasa) to be the abandonment of actions performed with desire, and the learned declare tyaga (renunciation) to be the abandonment of the fruits of all actions.
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः। यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे॥
कुछ विद्वान कर्म को दोषयुक्त मानकर त्याज्य कहते हैं, जबकि अन्य कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप रूप कर्मों का त्याग नहीं करना चाहिए।
Some learned people say that action should be abandoned as evil, while others declare that acts of sacrifice, charity, and austerity should not be abandoned.
निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम। त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः॥
हे भरतश्रेष्ठ! त्याग के विषय में मेरा निश्चित मत सुनो। हे पुरुषश्रेष्ठ! त्याग तीन प्रकार का कहा गया है।
Hear from Me the final truth about renunciation, O best of the Bharatas; renunciation has been declared to be of three kinds.
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्। यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥
यज्ञ, दान और तप रूप कर्मों का त्याग नहीं करना चाहिए; उन्हें करना ही चाहिए, क्योंकि ये कर्म बुद्धिमानों को पवित्र करने वाले हैं।
Acts of sacrifice, charity, and austerity should not be abandoned but should indeed be performed, for they purify the wise.
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च। कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्।
श्रीभगवान ने कहा - हे पार्थ! इन (यज्ञ, दान और तप रूप) कर्मों को भी आसक्ति और फल का त्याग करके करना चाहिए। यह मेरा निश्चित और उत्तम मत है।
The Supreme Lord said: O Partha, even these acts of sacrifice, charity and austerity should be performed, abandoning attachment and the fruits of action. This is My definite and supreme conviction.
नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते। मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः॥
नियत कर्म का त्याग उचित नहीं है; मोहवश उसका परित्याग तामस त्याग कहा जाता है।
The renunciation of prescribed duty is not proper; abandoning it out of delusion is declared to be tamasic.
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्। स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्॥
जो व्यक्ति किसी कर्म को केवल दुःखदायक मानकर और शारीरिक कष्ट के भय से त्याग देता है, वह राजसिक त्याग करता है और उसे त्याग का फल प्राप्त नहीं होता।
That abandonment of action which is done from fear of bodily trouble, thinking 'it is painful,' is rajasic abandonment, and one does not obtain the fruit of renunciation thereby.
कार्य्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन। सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः॥
हे अर्जुन! जो कर्म केवल कर्तव्य समझकर, आसक्ति और फल की इच्छा को त्यागकर किया जाता है, वह सात्त्विक त्याग माना गया है।
O Arjuna, when prescribed action is performed simply because it ought to be done, abandoning attachment and the fruit, such renunciation is regarded as sattvic.
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते। त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः।
भगवान श्री कृष्ण बोले- जो न तो अशुभ कर्म से द्वेष करता है और न शुभ कर्म में आसक्त होता है, वह सत्त्वगुण से युक्त, बुद्धिमान और संशयरहित पुरुष वास्तविक त्यागी है।
The Supreme Lord said: One who neither hates inauspicious work nor is attached to auspicious work, such a renunciant is endowed with goodness, is intelligent, and has all doubts cut away.
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः । यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते।
देहधारी के लिए सम्पूर्ण कर्मों का त्याग करना संभव नहीं है। परन्तु जो कर्मफल का त्याग करता है, वही त्यागी कहलाता है।
It is not possible for an embodied being to completely abandon all actions. But one who renounces the fruits of action is called a true renunciate.
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् । भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित्।
कर्म का फल तीन प्रकार का होता है - अनिष्ट (बुरा), इष्ट (अच्छा) और मिश्र (मिला-जुला)। यह फल मृत्यु के बाद त्यागियों (सकाम कर्म करने वालों) को मिलता है, परन्तु संन्यासियों (निष्काम कर्म करने वालों) को कभी नहीं मिलता।
The threefold fruit of action - undesirable, desirable, and mixed - accrues after death to those who are attached to results, but never to those who have renounced attachment to the fruits of action.
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे। साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्॥
हे महाबाहो! सम्पूर्ण कर्मों की सिद्धि के लिए सांख्य शास्त्र में कहे गए इन पाँच कारणों को तुम मुझसे समझो।
O mighty-armed Arjuna, learn from Me these five causes, as declared in the Sankhya teaching, for the accomplishment of all action.
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् । विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ।
अधिष्ठान (शरीर), कर्ता (जीवात्मा), करण (इन्द्रियाँ) तथा भिन्न-भिन्न प्रकार की चेष्टाएँ और पाँचवाँ दैव - ये पाँच कारण हैं।
The basis (body), the agent (individual soul), the instruments of various kinds (senses), the diverse efforts of different types, and providence as the fifth factor - these are the five causes.
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः। न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः॥
मनुष्य शरीर, वाणी और मन से जो भी न्यायोचित या विपरीत कर्म आरंभ करता है, उसके ये पांच कारण होते हैं।
Whatever action a man performs with his body, speech, or mind, whether right or wrong—these five are its causes.
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः। पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः।
इस प्रकार की स्थिति में जो व्यक्ति अपने को केवल कर्ता मानता है, वह अशुद्ध बुद्धि के कारण वास्तव में नहीं देखता, वह दुर्बुद्धि है।
Therefore, one who sees the soul as the sole doer due to impure understanding does not see truly - such a person is of perverted intelligence.
यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते। हत्वाऽपि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥
जिसका भाव अहंकार-रहित है और जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती, वह इन सब लोकों का वध करके भी वास्तव में न तो मारता है और न कर्मों से बंधता है।
One whose nature is free from the sense of being the doer, and whose intellect remains unattached, does not truly kill even if they slay these beings, nor are they bound by the action.
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना। करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः॥
ज्ञान, ज्ञेय (जानने योग्य वस्तु) और ज्ञाता (जानने वाला)—ये तीनों कर्म को प्रेरित करने वाले हैं, तथा करण (साधन), कर्म (क्रिया) और कर्ता—ये तीनों कर्म के संग्रह (आधार) हैं।
Knowledge, the object of knowledge, and the knower are the three factors that motivate action; the senses, the work, and the doer are the three constituents of action.
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः। प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि॥
ज्ञान, कर्म और कर्ता भी गुणों के भेद से तीन-तीन प्रकार के ही कहे गए हैं, जैसा कि गुणों के विवेचन में वर्णित है। उन्हें भी यथावत् सुन।
Knowledge, action, and the doer are declared to be of three kinds according to the distinctions of the gunas, as described in that philosophy. Hear of these as well.
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते। अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥
जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य समस्त प्राणियों में एक ही अविनाशी सत्ता को देखता है, तथा भिन्न-भिन्न प्राणियों में भी उस अविभाजित तत्त्व को देखता है, उस ज्ञान को तू सात्त्विक जान।
That knowledge by which one sees a single, imperishable reality in all beings, undivided within the divided — know that knowledge to be in the mode of goodness (sattva).
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्। वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्॥
परन्तु जो ज्ञान समस्त प्राणियों में भिन्न-भिन्न प्रकार के नाना भावों को अलग-अलग करके जानता है, उस ज्ञान को तू राजसिक जान।
But that knowledge which perceives the many distinct beings in all creatures as separate and unconnected from one another — know that knowledge to be in the mode of passion (rajas).
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्। अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्॥
परन्तु जो ज्ञान एक ही वस्तु या कार्य में इस प्रकार आसक्त हो जाता है मानो वही सब कुछ हो, जो युक्तिरहित है, सत्य पर आधारित नहीं है और सीमित है, वह ज्ञान तामसिक कहा गया है।
But that knowledge which clings to a single effect as though it were the whole, which is without reason, ungrounded in truth, and narrow in scope — that is declared to be knowledge in the mode of ignorance (tamas).
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम्। अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते॥
जो कर्म शास्त्र-विहित है, आसक्ति-रहित है, राग-द्वेष के बिना किया जाता है और फल की इच्छा न रखने वाले द्वारा किया जाता है, वह कर्म सात्त्विक कहलाता है।
Action that is prescribed by duty, free from attachment, done without like or dislike, and performed without craving for its results — that action is called sattvic.
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः। क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्॥
परन्तु जो कर्म कामना की पूर्ति के लिए अथवा अहंकार से युक्त होकर बड़े परिश्रम के साथ किया जाता है, वह कर्म राजसिक कहा गया है।
But action performed by one longing for the fulfillment of desires, or driven by ego, and carried out with great strain, is declared to be rajasic.
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम्। मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते॥
जो कर्म परिणाम, हानि, दूसरों को होने वाली क्षति और अपनी सामर्थ्य पर विचार किए बिना, केवल मोहवश आरम्भ किया जाता है, वह कर्म तामसिक कहा जाता है।
Action undertaken out of delusion, without regard for its consequences, loss, harm to others, or one's own ability — that action is called tamasic.
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः। सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते।
श्री भगवान बोले - जो संग रहित, अहंकार रहित, धैर्य और उत्साह से युक्त तथा सिद्धि और असिद्धि में निर्विकार रहता है, वह कर्ता सात्त्विक कहा जाता है।
The Blessed Lord said: One who is free from attachment and egotism, endowed with determination and enthusiasm, and remains unperturbed in success and failure - such a doer is called sattvic.
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः। हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः।
जो कर्ता रागयुक्त, कर्मफल की इच्छा करने वाला, लोभी, हिंसक स्वभाव वाला, अपवित्र और हर्ष-शोक से युक्त है, वह राजस कहा जाता है।
The doer who is passionate, seeks the fruits of action, is greedy, violent in nature, impure, and subject to joy and sorrow, is said to be rajasic.
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः। विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते॥
जो कर्ता अनुशासनहीन, असंस्कारी, हठी, कपटी, दूसरों की जीविका को हानि पहुँचाने वाला, आलसी, विषादग्रस्त और काम को टालने वाला होता है, वह तामसिक कहा जाता है।
A doer who is undisciplined, coarse, obstinate, deceitful, harmful to others' livelihood, slothful, prone to despair, and a procrastinator is said to be of the nature of ignorance (tamas).
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु। प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय॥
हे धनञ्जय! अब बुद्धि और धृति के भी गुणों के अनुसार तीन-तीन प्रकार के भेद को, मेरे द्वारा विस्तार से पृथक्-पृथक् कहे जाने पर, सुन।
O Dhananjaya, now hear from Me, described fully and separately, the threefold distinctions of intellect and steadfastness according to the three modes of nature.
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये। बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी।
हे पार्थ! जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्ति को, कर्तव्य और अकर्तव्य को, भय और अभय को तथा बंधन और मोक्ष को जानती है, वह बुद्धि सात्त्विकी है।
That intellect which knows action and inaction, duty and non-duty, fear and fearlessness, bondage and liberation - that intellect, O Partha, is sattvic (pure).
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च। अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी।
हे पार्थ! जो बुद्धि धर्म और अधर्म को, कार्य और अकार्य को यथार्थ रूप से नहीं जानती, वह बुद्धि राजसी है।
O Partha! That intellect which does not properly understand dharma and adharma, what ought to be done and what ought not to be done, is rajasic.
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता। सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी॥
हे पार्थ! जो बुद्धि अंधकार से आवृत होकर अधर्म को धर्म मान लेती है और सभी वस्तुओं को विपरीत रूप में देखती है, वह बुद्धि तामसी है।
O Partha, the intellect which, shrouded in darkness, mistakes what is wrong for what is right and sees everything in a distorted way, is an intellect of the nature of ignorance (tamas).
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः। योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी॥
हे पार्थ! जिस अटूट योगयुक्त धृति के द्वारा मनुष्य मन, प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को धारण करता है, वह धृति सात्त्विकी है।
O Partha, the unwavering steadfastness by which one, through yoga, sustains the workings of the mind, life-force, and senses — that steadfastness is sattvic.
यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन। प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी॥
परन्तु हे अर्जुन! जिस धृति के द्वारा मनुष्य फल की आकांक्षा से आसक्त होकर धर्म, अर्थ और काम को पकड़े रहता है, हे पार्थ, वह धृति राजसी है।
But O Arjuna, the steadfastness by which one clings, out of attachment and desire for reward, to duty, wealth, and pleasure — that steadfastness, O Partha, is of the mode of passion (rajas).
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च। न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी॥
हे पार्थ! जिस धृति के द्वारा दुर्बुद्धि मनुष्य निद्रा, भय, शोक, विषाद और मद को नहीं छोड़ता, वह धृति तामसी है।
O Partha, the steadfastness by which a person of dull understanding does not let go of dreaming, fear, grief, despair, and conceit — that steadfastness is of the nature of ignorance (tamas).
सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ। अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥
हे भरतश्रेष्ठ! अब तू मुझसे तीन प्रकार के सुख के बारे में सुन, जिसमें मनुष्य अभ्यास द्वारा रमण करता है और दुःख के अंत को भी प्राप्त कर लेता है।
Now hear from Me, O best of the Bharatas, of the threefold happiness in which one comes to delight through practice, and through which one reaches the end of suffering.
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्। तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्॥
जो सुख आरम्भ में विष के समान प्रतीत होता है परन्तु परिणाम में अमृत के समान होता है, वह सुख सात्त्विक कहा गया है, जो आत्मा में स्थित बुद्धि की प्रसन्नता से उत्पन्न होता है।
That happiness which seems like poison at first but is like nectar in the end — born of the clarity of a mind settled in the self — is called happiness of the nature of goodness (sattva).
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्। परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्॥
जो सुख विषयों और इन्द्रियों के संयोग से आरम्भ में अमृत के समान प्रतीत होता है, किन्तु परिणाम में विष के समान होता है, वह सुख राजसिक कहा गया है।
The happiness that arises from the contact of the senses with their objects, which seems like nectar at first but turns to poison in the end, is said to be happiness of the mode of passion (rajas).
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः। निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्॥
जो सुख आरम्भ से लेकर अंत तक आत्मा को मोहित करने वाला है और नींद, आलस्य तथा प्रमाद से उत्पन्न होता है, वह सुख तामसिक कहा गया है।
The happiness which deludes the self from beginning to end, and which arises from sleep, laziness, and negligence, is declared to be happiness of the nature of ignorance (tamas).
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः। सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः॥
पृथ्वी पर या स्वर्ग में देवताओं के बीच भी ऐसा कोई प्राणी नहीं है, जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीन गुणों से मुक्त हो।
There is no being, either on earth or among the gods in heaven, who is free from these three gunas born of material nature.
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप। कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः।
श्री भगवान बोले - हे परन्तप! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसार विभाजित किए गए हैं।
The Blessed Lord said: The duties of Brahmins, Kshatriyas, Vaishyas, and Shudras are distributed according to the qualities born of their own nature, O scorcher of enemies.
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च। ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्॥
मन का संयम, इन्द्रियों का संयम, तप, पवित्रता, सहनशीलता, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता — ये ब्राह्मण के स्वभाव से उत्पन्न कर्म हैं।
Tranquility, self-restraint, austerity, purity, forbearance, integrity, knowledge, wisdom, and faith in the divine — these are the duties born of a Brahmin's own nature.
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्। दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्।
श्री भगवान बोले- शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुराई, युद्ध में न भागना, दान देना और स्वामी का भाव - ये सब क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं।
The Blessed Lord said: Heroism, vigor, firmness, skill, not fleeing from battle, generosity and leadership - these are the natural duties of the Kshatriyas, born of their inherent nature.
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्। परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्।
श्री भगवान बोले - कृषि, गौ-रक्षा और व्यापार ये वैश्य के स्वभाव से उत्पन्न कर्म हैं तथा सेवा-परायण कर्म शूद्र का भी स्वभाव से उत्पन्न कर्म है।
The Blessed Lord said: Agriculture, cattle-rearing, and trade are the natural work of the Vaishyas; work of a serving nature is the natural work of the Shudras, born of their inherent nature.
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
अपने-अपने कर्म में तत्पर रहकर मनुष्य सिद्धि को प्राप्त करता है। अपने कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार सिद्धि को प्राप्त करता है, वह अब मुझसे सुन।
A person attains perfection by being devoted to their own natural duty. Now hear from Me how one devoted to one's own work attains that perfection.
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्। स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥
जिससे समस्त प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, उसकी अपने ही कर्म द्वारा पूजा करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त करता है।
By worshipping, through one's own natural work, the source from whom all beings arise and by whom this entire universe is pervaded, a person attains perfection.
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥
अपने धर्म का पालन करना, चाहे वह गुणरहित हो, दूसरे के भली-भाँति किए गए धर्म से श्रेष्ठ है। अपने स्वभाव से नियत कर्म करते हुए मनुष्य को पाप नहीं लगता।
It is better to perform one's own duty imperfectly than to perform another's duty well. By doing the work prescribed by one's own nature, a person does not incur sin.
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्। सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः।
हे कुन्तीपुत्र! सहज कर्म को दोषयुक्त होने पर भी त्यागना नहीं चाहिए, क्योंकि सभी कर्म दोषों से घिरे हुए हैं जैसे अग्नि धुएं से घिरी रहती है।
O son of Kunti, one should not abandon the duty born of one's nature, even if it is defective, for all undertakings are enveloped by defects as fire is enveloped by smoke.
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः। नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति॥
जिसकी बुद्धि सर्वत्र आसक्ति-रहित है, जिसने अपने मन को जीत लिया है और जो इच्छाओं से रहित है, वह त्याग के द्वारा नैष्कर्म्य की परम सिद्धि को प्राप्त करता है।
One whose intellect is unattached everywhere, who has mastered the mind, and is free from craving, attains through renunciation the supreme perfection of freedom from the bondage of action.
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे। समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा।
श्री भगवान बोले - हे कुन्तीपुत्र! सिद्धि को प्राप्त हुआ मनुष्य जिस प्रकार से ब्रह्म को प्राप्त होता है, उस ज्ञान की परा निष्ठा को तू मेरे से संक्षेप में जान।
The Blessed Lord said: Learn from Me, O Kaunteya, how one who has attained perfection reaches Brahman - that supreme consummation of knowledge, described briefly.
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च। शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च।
श्री भगवान ने कहा - शुद्ध बुद्धि से युक्त होकर, धैर्य के साथ मन को नियंत्रित करके, शब्द आदि विषयों को त्यागकर और राग-द्वेष को दूर करके।
The Supreme Lord said: Endowed with purified intelligence, controlling the mind with determination, abandoning sound and other objects of the senses, and casting aside attraction and aversion.
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः। ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः।
भगवान श्री कृष्ण बोले - जो एकांत स्थान में रहता है, अल्प आहार करता है, वाणी, शरीर और मन को वश में रखता है, सदैव ध्यानयोग में लगा रहता है और वैराग्य का आश्रय लेता है।
The Blessed Lord said: One who resorts to solitude, eats sparingly, controls speech, body and mind, is ever engaged in meditation and yoga, and takes refuge in dispassion.
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्। विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥
अहंकार, हठपूर्ण बल, दर्प, काम, क्रोध और संग्रह की वृत्ति — इनका त्याग करके, ममता-रहित और शांत हुआ मनुष्य ब्रह्म-प्राप्ति के योग्य हो जाता है।
Freed from egotism, forceful assertion, arrogance, desire, anger, and possessiveness — free from any sense of 'mine' and settled in peace — a person becomes fit for oneness with Brahman.
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति। समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्।
ब्रह्मभूत होकर प्रसन्न आत्मावाला वह न शोक करता है और न कामना करता है। सब प्राणियों में समभाव रखता हुआ वह मेरी परा भक्ति को प्राप्त होता है।
Being one with Brahman and serene in mind, he neither grieves nor desires. Regarding all beings equally, he attains supreme devotion to Me.
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः। ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्।
श्री भगवान बोले - भक्ति के द्वारा वह मुझे यथार्थ में जानता है कि मैं कितना हूँ और कौन हूँ, फिर मुझे तत्त्व से जानकर तत्काल ही मुझमें प्रवेश कर जाता है।
The Supreme Lord said: By devotion alone can one truly know Me as I am, in My true nature and magnitude. Having known Me in truth, one immediately enters into My being.
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः। मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्।
श्री भगवान बोले - मेरे आश्रय में रहकर सदा सभी कर्म करता हुआ भक्त मेरी कृपा से शाश्वत अविनाशी परम पद को प्राप्त होता है।
The Blessed Lord said: Though engaged in all kinds of activities, one who takes shelter in Me attains the eternal, imperishable abode by My grace.
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः। बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव।
श्री भगवान बोले- मन से सब कर्मों को मुझमें अर्पण करके, मेरे परायण होकर, बुद्धियोग का आश्रय लेकर निरन्तर मेरे में चित्त वाला हो।
The Blessed Lord said: Dedicating all actions to Me with your mind, being devoted to Me, taking refuge in the yoga of discrimination, keep your consciousness constantly fixed on Me.
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि। अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि।
श्री भगवान बोले - मुझमें चित्त लगाकर तू मेरी कृपा से सम्पूर्ण कठिनाइयों को पार कर जाएगा और यदि अहंकारवश मेरी बात नहीं सुनेगा तो नष्ट हो जाएगा।
The Supreme Lord said: By fixing your mind upon Me, you shall overcome all obstacles by My grace; but if you do not listen due to ego, you shall perish.
यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे। मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति॥
अहंकार के आश्रय से तू यह मानता है कि मैं युद्ध नहीं करूंगा। यह तेरा संकल्प मिथ्या है क्योंकि तेरी प्रकृति तुझे युद्ध करने के लिए बाध्य करेगी।
If, taking refuge in ego, you think 'I will not fight,' this resolve of yours is false. Your own nature will compel you to action.
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा। कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्॥
हे कौन्तेय! अपने स्वभाव से उत्पन्न कर्म से बंधा हुआ तू जिसे मोहवश करना नहीं चाहता, उसे भी विवश होकर करेगा।
O son of Kunti, bound by the action born of your own nature, that which out of delusion you do not wish to do, you will do anyway, helplessly, driven by that very nature.
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।
हे अर्जुन! ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में स्थित है और अपनी माया से सभी प्राणियों को, जो यन्त्र पर आरूढ़ की भाँति हैं, भ्रमण कराता रहता है।
The Lord dwells in the hearts of all beings, O Arjuna, causing all beings to revolve by His maya as if they were mounted on a machine.
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत। तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।
हे भारत! तू सर्वभाव से उसी परमेश्वर की शरण में जा। उसकी कृपा से तू परम शान्ति को और शाश्वत धाम को प्राप्त करेगा।
O Bharata, surrender yourself completely to Him alone. By His grace, you will attain supreme peace and the eternal abode.
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया। विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु।
श्रीभगवान बोले - इस प्रकार तुम्हें मैंने गुह्य से भी अति गुह्य ज्ञान कहा है। इसे भली भाँति विचार करके, जैसी तुम्हारी इच्छा हो, वैसा करो।
The Blessed Lord said: Thus I have explained to you the most secret knowledge. Ponder over it deeply and completely, and then act as you wish.
सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः। इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्।
श्री भगवान् ने कहा: हे अर्जुन! सभी गुह्यों से अति गुह्य मेरे परम वचन को फिर से सुनो। तू मुझे अत्यन्त प्रिय है, इसलिए मैं तेरे हित की बात कहूँगा।
The Supreme Lord said: Listen again to My supreme word, the most confidential of all knowledge. Because you are My very dear friend, I am speaking to you for your benefit.
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे।
श्री भगवान बोले: मुझमें मन लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरा यज्ञ करो और मुझे प्रणाम करो। तू मुझे ही प्राप्त होगा, यह मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ क्योंकि तू मेरा प्रिय है।
The Supreme Lord said: Fix your mind on Me, be devoted to Me, worship Me, and bow down to Me. Truly I promise you, you shall come to Me alone, for you are dear to Me.
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।
भगवान श्री कृष्ण बोले - सभी धर्मों को त्यागकर केवल मेरी शरण में आ जा। मैं तुझे सभी पापों से मुक्त कर दूंगा, शोक मत कर।
The Supreme Lord said: Abandoning all varieties of dharma, take refuge in Me alone. I shall deliver you from all sinful reactions; do not grieve.
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन। न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति॥
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- यह गीता का ज्ञान न तो तपरहित व्यक्ति से कहना चाहिए, न भक्तिरहित से कभी कहना चाहिए और न सुनने की इच्छा न रखने वाले से कहना चाहिए तथा जो मुझमें दोषदृष्टि रखता है, उससे भी नहीं कहना चाहिए।
The Supreme Lord said: This knowledge should never be spoken to one who is not austere, nor to one who is not devoted, nor to one who does not wish to listen, nor to one who speaks ill of Me.
य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति। भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः।
जो व्यक्ति इस परम गुह्य ज्ञान को मेरे भक्तों में कहेगा, वह मुझमें परम भक्ति करके निःसंदेह मुझे ही प्राप्त होगा।
One who shares this supreme secret with My devotees, having shown supreme devotion to Me, shall certainly come to Me alone.
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः। भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि॥
मनुष्यों में मेरे लिए इससे बढ़कर प्रिय कार्य करने वाला कोई नहीं है, और न ही पृथ्वी पर मुझे इससे अधिक प्रिय कोई अन्य होगा।
There is no one among men who renders more dear service to Me than he, nor shall there ever be another on earth dearer to Me than he.
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः। ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः।
जो व्यक्ति हमारे इस धर्ममय संवाद का अध्ययन करेगा, वह ज्ञानयज्ञ के द्वारा मेरी पूजा करेगा - ऐसा मेरा मत है।
One who studies this sacred dialogue between us will worship Me through the sacrifice of knowledge - this is My conviction.
श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः। सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्।
जो मनुष्य श्रद्धावान् है, दोषदृष्टि से रहित है और केवल इस गीता को सुनता भी है, वह भी पापों से मुक्त होकर पुण्यकर्म करने वालों के शुभ लोकों को प्राप्त होता है।
One who listens to this sacred dialogue with faith and without envy is also freed from sin and attains the auspicious worlds of those who perform righteous deeds.
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा। कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय॥
हे पार्थ! क्या तूने इस ज्ञान को एकाग्रचित्त होकर सुना है? हे धनञ्जय! क्या तेरा अज्ञानजनित मोह अब नष्ट हो गया है?
O Partha, have you heard this with a one-pointed mind? O Dhananjaya, has your delusion born of ignorance now been dispelled?
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत। स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव।
अर्जुन बोले - हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और स्मृति प्राप्त हुई है। अब मैं संशयरहित होकर स्थित हूँ और आपकी आज्ञा का पालन करूँगा।
Arjuna said: O Achyuta! By Your grace, my delusion is destroyed and I have regained my memory. I am now firmly established, free from doubt, and shall act according to Your word.
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः। संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्।
संजय बोले - इस प्रकार मैंने वासुदेव (श्रीकृष्ण) और महात्मा पार्थ (अर्जुन) के इस अद्भुत और रोमांचक संवाद को सुना।
Sanjaya said: Thus I have heard this wonderful and thrilling dialogue between Vasudeva (Krishna) and the great-souled Partha (Arjuna), which causes the hair to stand on end.
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम्। योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयत: स्वयम्।
व्यास के प्रसाद से मैंने इस परम गुह्य योग को सुना है, जो स्वयं योगेश्वर कृष्ण द्वारा प्रत्यक्ष कहा गया है
By the grace of Vyasa, I have heard this supreme secret of yoga directly from Krishna, the Lord of Yoga himself, speaking in person
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्। केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः।
संजय ने कहा - हे राजन्! केशव और अर्जुन के इस अद्भुत और पुण्य संवाद को बार-बार स्मरण करके मैं बारम्बार हर्षित हो रहा हूँ।
Sanjaya said: O King! Remembering again and again this wonderful and sacred dialogue between Keshava and Arjuna, I rejoice repeatedly.
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः। विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः॥
हे राजन्! श्रीहरि के उस अत्यंत अद्भुत रूप का बार-बार स्मरण करके मुझे महान आश्चर्य होता है और मैं पुनः-पुनः हर्षित होता हूँ।
Sanjaya said: And remembering again and again that most wonderful form of Hari, O King, my astonishment is great, and I rejoice over and over again.
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम।
संजय कहते हैं - जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धर अर्जुन है, वहाँ श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है - यह मेरा दृढ़ मत है।
Sanjaya said: Wherever there is Krishna, the Lord of Yoga, and wherever there is Arjuna, the wielder of the bow, there will surely be prosperity, victory, glory, and righteousness - this is my firm conviction.
अध्याय 18 - सभी श्लोक
Chapter 18 - Original Sanskrit Slokas
सन्न्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् । त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन।
काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः। सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः।
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः। यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे॥
निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम। त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः॥
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्। यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च। कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्।
नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते। मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः॥
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्। स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्॥
कार्य्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन। सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः॥
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते। त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः।
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः । यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते।
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् । भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित्।
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे। साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्॥
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् । विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ।
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः। न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः॥
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः। पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः।
यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते। हत्वाऽपि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना। करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः॥
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः। प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि॥
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते। अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्। वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्॥
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्। अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्॥
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम्। अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते॥
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः। क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्॥
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम्। मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते॥
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः। सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते।
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः। हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः।
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः। विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते॥
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु। प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय॥
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये। बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी।
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च। अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी।
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता। सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी॥
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः। योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी॥
यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन। प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी॥
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च। न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी॥
सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ। अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्। तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्॥
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्। परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्॥
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः। निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्॥
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः। सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः॥
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप। कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः।
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च। ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्॥
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्। दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्।
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्। परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्। स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्। सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः।
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः। नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति॥
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे। समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा।
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च। शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च।
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः। ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः।
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्। विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति। समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्।
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः। ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्।
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः। मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्।
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः। बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव।
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि। अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि।
यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे। मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति॥
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा। कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्॥
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत। तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया। विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु।
सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः। इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्।
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे।
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन। न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति॥
य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति। भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः।
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः। भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि॥
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः। ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः।
श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः। सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्।
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा। कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय॥
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत। स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव।
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः। संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्।
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम्। योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयत: स्वयम्।
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्। केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः।
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः। विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः॥
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम।
Gyan-centric Section · Knowledge & Liberation
ज्ञान · ज्ञानयोग / ज्ञान · ज्ञान और मोक्ष
Metaphysics, nature of consciousness, liberation.
तत्त्वज्ञानम्, चेतनायाः स्वरूपम्, मोक्षश्च।
तत्वमीमांसा, चेतना का स्वरूप, मुक्ति।
Carry Divine Wisdom Everywhereश्रीमद्भगवद्गीता एंड्रॉयड ऐप
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